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Sunday, 10 August 2025

हरियाली तीज 🥑🍏🍒🥭🍍🍊🍐🥒





हरियाली तीज, ऐसी मान्यता हैं कि इस दिन माता गौरा को विरहाग्नि में तपकर भगवान शिव को पति रूप मे प्राप्त करने का वरदान स्वयं शिव जी से मिला था। वैसे इसदिन स्त्रियों को  वर,उपहार देने का विशेष महत्व है । 

 




यह त्यौहार श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को उत्तरी भारत के सब नगरों में विशेष रूप से मनाया जाता है। घर-घर में झूले पड़ते हैं। नारियों के समूह गा-गाकर झूला तुलती है। सावन में सुन्दर से सुन्दर पकवान, गुंजिया, घेवर, कनी आदि बेटियों को सिंधारा भेजा जाता है। इस तीज पर मेंहदी लगाने का शेष महत्त्व है। स्त्रियाँ हाथों पर मेंहदी से भिन्न-भिन्न प्रकार बेल-बूटे बनाती हैं। तीजों पर मेंहदी रचाने की कलात्मक धियाँ परम्परा से स्त्री समाज में चली आ रही हैं। स्त्रियाँ पैरों में आलता भी लगाती हैं जो सुहाग का चिह्न माना जाना है

इस तीज पर निम्न बातों को त्यागने का विधान है - 1. ने छल कपट, 2. झूठ बोलना एवं दुर्व्यवहार, 3. परनिन्दा 




 कथा :-

भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन की एक सुंदर पर्व हैं हरियाली तीज। इस पर्व से जुड़ी कथा में आप जानेंगे कि किस प्रकार माता पार्वती ने भगवान भोलेनाथ को अपने पति परमेश्वर के रूप में प्राप्त किया। हरियाली तीज व्रत कथा के अनुसार, इस कथा का वाचन स्वयं भगवान शिव ने माता पार्वती के समक्ष किया था।


माता पार्वती ने हिमालय पर्वत के घर में जन्म लिया था, और बचपन से ही उन्होंने भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त करने का दृढ़ संकल्प ले लिया था। उन्होंने कई वर्षों तक हिमालय पर्वत पर विषम परिस्थितियों का सामना करते हुए कठोर तपस्या की। यह देखकर देवी पार्वती के पिता पर्वत राज अत्यंत चिंतित हो गए थे। 

पार्वती ने तो मन ही मन में भगवान भोलेनाथ को अपने जीवनसाथी के रूप में स्वीकार कर लिया था।

 इसके बाद अपनी सखियो के साथ पार्वती ने भगवान शिव की पूजा के लिए रेत के शिवलिंग का निर्माण किया और वह घोर तपस्या में लीन हो गईं। संयोग से माता पार्वती ने शिवलिंग की स्थापना भाद्रपद की शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र में की थी और साथ ही उन्होंने निर्जला व्रत भी रखा था। आखिरकार बहुत कठिन परीक्षा के पश्चात भगवान शिव माता पार्वती की सच्ची निष्ठा और तप से प्रसन्न हुए और उनकी मनोकामना पूर्ण होने का वरदान दे दिया। इसके बाद माता पार्वती ने व्रत का पारण किया।


 इस प्रकार उन्होंने भगवान भोलेनाथ को अपने वर के रूप में प्राप्त करने का संकल्प पूर्ण कर लिया है। तत्पश्चात उनके पिता भी अपनी पुत्री का विवाह भगवान शिव से करवाने के लिए तैयार हो गए। अंततः भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह विधि पूर्वक संपन्न हुआ। इस प्रकार भगवान शिव और पार्वती का पुनर्मिलन संभव हो पाया।



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